सफलता का शॉर्टकट वीर्य-रक्षा

सत्यजीत पाटीदार

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प्रेरणा

आध्यात्मिक काम विज्ञान की जानकारी हमें सर्वसाधारण तक पहुंचानी ही चाहिए. सृष्टि के इतने महत्वपूर्ण विषय को जिसकी जानकारी प्रकृति जीव‑जन्तुओं तक को करा देती है, उसे गोपनीय नहीं रखा जाना चाहिए. खासतौर से तब जबकि इस महत्वपूर्ण विज्ञान का स्वरूप लगभग पूरी तरह से विकृत और उलटा हो गया हो. जो मान्यतायें चल रही हैं, वे ही चलने दी जायें, सुलझे हुए समाधान और सुरुचिपूर्ण प्रावधान यदि प्रस्तुत न किए गये तो विकृतियाँ ही बढ़ती, पनपती चली जायेंगी और उससे मानव जाति एक महती शक्ति का दुरुपयोग करके अपना सर्वनाश ही करती रहेगी. समय आ गया कि काम-विद्या के तत्व-ज्ञान का संयत और विज्ञान सम्मत प्रतिपादन करने का साहस किया जाये और संकोच का यह पर्दा उठा दिया जाये कि इस महान विद्या की विवेचना हर स्तर पर अश्लील ही मानी जायेगी, उसे हर स्थिति में गोपनीय ही रखा जाना चाहिए. यह संकोच मानव-जाति को एक महान लाभ से वंचित ही रखे रहेगा.

सावित्री कुण्डलिनी एवं तंत्र - AWGP

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वीर्य के पर्यायवाची

• वीर्य पुरुषों में शुक्राणु युक्त रस है
• वीर्य महिलाओं में अंडाणु युक्त रस है
• वीर्य मैं (स्वयं) है
• वीर्य प्राण ऊर्जा है
• वीर्य आत्मा है
• वीर्य ईश्वर है
• वीर्य चित्त (मानस) है
• वीर्य अहंकार (नाम या पहचान) है
• वीर्य अवचेतन या अवचेतन मन है
• वीर्य जीवन चेतना है
• वीर्य अंतरात्मा है

• वीर्य झायगोट है
• वीर्य बीज है
• वीर्य गुणसूत्र है
• वीर्य डीएनए कुंडली है
• वीर्य जीवन कुंडली है
• वीर्य तीसरी आँख है
• वीर्य छठी इन्द्री है
• वीर्य अमृत है, अगर वीर्य-रक्षा करते हैं
• वीर्य ज़हर है, अगर वीर्य-क्षरण करते हैं

आत्मा या वीर्य

पॉकेट यूनिवर्स

आत्मा या वीर्य डीएनए जीवन में सफलता के  लिए

प्रकृति के संसाधनों को आकर्षित करने वाला सॉफ्टवेयर है

वीर्य ब्रह्मा का बीज है, जो हमारे सपनों का ब्रह्मांड बनाता है

मनुष्य की दो महान शक्तियां

वीर्य और बुद्धि, ये दो महान शक्तियों के साथ मनुष्य स्वयं ईश्वर ही है. बुद्धि जो भी विचार करे, वीर्य उसे वास्तविकता में रूपांतरित करता है.

मनुष्य जीवन का मूल आधार

वृक्ष की जड़ की भांति मनुष्य का मूलाधार वीर्य ही, प्राण ऊर्जा के द्वारा, जीवन में सफलता के जरूरी संसाधन प्रकृति नेटवर्क से आकर्षित करता है.

मनुष्य जीवन के दो रास्ते

‘मरणं बिंदु पातेन, जीवनं बिंदु धारणात्.’ अर्थात वीर्य-क्षरण असफलता रूपी मृत्यु है और वीर्य.रक्षा सफलता रूपी जीवन है.

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एक अलाभकारी लोकोपकार

युवाओं की पहली शिक्षा

हर मनुष्य की अपनी-अपनी इच्छाएं या सपने होते हैं. उनको पूरा करने के लिए सभी अपने जीवन में सफलता पाना चाहते हैं. हमने अकसर सुना है कि सफलता बहुत मेहनत से मिलती है और सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता है.

लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए लांगकट वाले अनगिनत रास्ते हो सकते हैं, लेकिन उन्हीं में से सीधी रेखा वाला एक शार्टकट रास्ता जरूर होता है. चूंकि उस छोटे रास्ते के बारे में सभी को पता होता है, इसलिए सभी उस शार्टकट रास्ते पर चलकर सफलता से सफ़र पूरा कर लेते हैं.

इसी तरह किसी भी प्रश्न के अनगिनत गलत उत्तर हो सकते हैं, लेकिन उसका एक ही सही उत्तर होता है. चूंकि प्रश्न के बारे में हमें ज्ञात नहीं होता है, इसलिए सही उत्तर की संभावना हमारी जानकारी पर निर्भर करती है. यदि हमें पूछे जाने वाले प्रश्न के बारे में ज्ञात हो जाये तो पूर्व तैयारी करके हम सभी उसका सही उत्तर देकर सफल हो सकते हैं.

इसी तरह मनुष्य जीवन को औसत या असफलता के साथ जीने लिए अनगिनत लांगकट तरीके हो सकते हैं, लेकिन जीवन में सुनिश्चित सफलता पाने का एक ही शार्टकट तरीका होता है. कुछ ही व्यक्ति जो जीवन में अपार सफलता प्राप्त कर पाते हैं, वे सभी जाने या अनजाने उस शार्टकट तरीके का ही उपयोग करते हैं. यदि वह शार्टकट तरीका ज्ञात हो जाये, तो उसका उपयोग करके सभी को सुनिश्चित सफलता मिल सकती है. तो सफलता का शार्टकट क्या है?

पृथ्वी पर वनस्पतियों, प्राणियों और मनुष्यों में ही जीवन पाया जाता है. समान प्रकार की सभी वनस्पतियों में समान मात्रा में फूल, फल और बीज लगते हैं. वे सभी लगभग समान मात्रा में हमें आक्सीजन, लकड़ी और छाया आदि भी प्रदान करते हैं. इस तरह सभी वनस्पतियों को सुनिश्चित सफलता मिलती है, यानी वनस्पतियों में सफलता की दर 100 प्रतिशत होती है. इसी प्रकार, समान प्रकार के प्राणी भी समान रूप से अपना जीवन जीते हैं. किसी भी बाहरी सुविधाओं के नहीं होने के बावजूद, सभी प्राणी स्वस्थ रहते हुए एक समान अच्छा जीवन जीते हैं. वे सभी अपनी क्षमतानुसार प्रकृति के लिए योगदान भी देते हैं. इस प्रकार, प्राणियों में भी सफलता की दर 100 प्रतिशत होती है. लेकिन मनुष्यों के संदर्भ में सफलता की दर बिलकुल ही विपरीत है. वनस्पतियों और प्राणियों के पास बुद्धि नहीं होती है, परंतु हर मनुष्य के पास सुपर‑कंप्यूटर से भी तेज बुद्धि भी होती है. बुद्धि जैसे प्रकृति के अनमोल उपहार होने के बावजूद, मनुष्यों में सफलता की दर एक प्रतिशत से भी कम होती है.

आखिर क्या कारण है कि बुद्धि होते हुए भी अधिकांश मनुष्य असफलता भरा जीवन जीते हैं और बुद्धि नहीं होते हुए भी सभी वनस्पति और प्राणी सुनिश्चित सफलता भरा जीवन जीते हैं? सुनिश्चित सफलता का रहस्य वनस्पतियों और प्राणियों के रहन सहन के तरीके में छिपा हुआ है और वही मनुष्यों के जीवन में भी सफलता का एकमात्र शार्टकट है. सभी जीवधारियों को भोजन और सांसों के माध्यम से, जीवन जीने के लिए एक प्राकृतिक संसाधन मिलता है. सभी वनस्पति और प्राणी नैसर्गिक रूप से उस संसाधन का संरक्षण करते हैं, इसलिए उन सभी को सुनिश्चित सफलता मिलती है. अधिकांश मनुष्यों को उस संसाधन के बारे में सही जानकारी नहीं है या उसके बारे में बहुत गलतफहमी है और अज्ञानता वश उसी संसाधन को नष्ट करते रहते हैं, इसीलिए अधिकांश मनुष्यों को सफलता नहीं मिल पाती है.

वृक्ष के आधार भाग में जड़ और ऊपरी भाग में शिखर होता है. जड़ (या मूल) ही पूरे शिखर का पालन-पोषण करता है. उसी तरह हमारे शरीर के आधार भाग में मूलाधार और मस्तिष्क भाग में सहस्रार होता है. यह मूलाधार ही सम्पूर्ण शरीर का पालन पोषण करते हुए जीवन में सफलता दिलाता है. जिस तरह वृक्ष को जड़ से काट देने पर शिखर सूख जाता है, उसी तरह अधिकांश मनुष्य अपना मूलाधार नष्ट करते हुए जीवन में असफलता ही पाते हैं. जीवन में सफलता का एकमात्र शार्टकट यही है कि मनुष्य अपने मूलाधार यानी वीर्य की रक्षा करे. यहाँ वीर्य का संदर्भ पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए है. वीर्य-रक्षा का तात्पर्य है कि सिर्फ जीवन साथी के साथ ही विवाहित जीवन का आनंद लें. इसके अतिरिक्त किसी भी अप्राकृतिक तरीके (हस्तमैथुन, अवैध संबंध, पोर्नोग्राफी, अश्लील मानसिकता, आदि) से अपने वीर्य (पुरुषों में शुक्राणु या महिलाओं में अंडाणु) का क्षरण नहीं करे.

वीर्य मनुष्य जीवन का महत्वपूर्ण ईंधन है और इसकी रक्षा से, हमें जीवन में सुनिश्चित सफलता मिलती है.

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आत्म-साक्षात्कार

मैं वीर्य हूँ वीर्य आत्मा है आत्मा ईश्वर है

मैं कौन हूँ? हम अकसर इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहते हैं. इसका उत्तर आसानी से समझने के लिए, हम अपने छोटे से छोटे रूप की कल्पना करें. शारीरिक जीवन का हमारा सबसे छोटा रूप, हमारे जन्मदिन और जन्म-समय का होता है, जब हम अपनी माँ के गर्भ से इस दुनिया में जन्म लेकर, अपनी सांसें लेना शुरू करते हैं. हम अपनी आयु की गिनती अपने जन्म के समय से ही करते हैं. लेकिन अपने शारीरिक जन्म के पहले, लगभग नौ महीने का गर्भ काल, हम अपनी माँ के गर्भ में गुजारते हैं. माँ के गर्भ में हमारा सबसे छोटा रूप वह होता है, जब हमारे माता-पिता के वीर्य बीजों से, एक भ्रूण के रूप में हमारे आत्मिक जीवन की शुरुआत होती है. अणु आकार का वही वीर्य बीज, हमारी बुद्धि, शरीर और आत्मा के साथ, नवजात बनकर जन्म लेता है और फिर वही नवजात, संपूर्ण मनुष्य बनकर अपना चल-अचल संसार बनाता है. माता‑पिता के वीर्य बीज से बनने वाला भ्रूण ही हमारा सूक्ष्मतम रूप होता है, अर्थात अपने सूक्ष्मतम रूप में, मैं वीर्य हूँ.

वीर्य क्या है? सैद्धांतिक मान्यता अनुसार प्रथम मनुष्य के जन्म के लिए, सबसे पहले ईश्वर ने अपने अंश से एक ईश्वरीय वीर्य बीज की रचना की होगी. ईश्वर के उसी एकमात्र वीर्य बीज का एक से अनेक में विभाजन होते हुए से, धरती पर पीढ़ी दर पीढ़ी सभी मनुष्यों का जन्म होता है. ईश्वर से हमारे जन्म तक, पीढ़ी दर पीढ़ी का वंशक्रम क्रमशः इस तरह चलता आया है...

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ईश्वर ने अपने अंश से ईश्वरीय वीर्य की रचना की.

फिर ईश्वर के ईश्वरीय वीर्य से प्रथम-जीवन का जन्म हुआ.

फिर प्रथम-जीवन के ईश्वरीय वीर्य से क्रमशः हमारे पूर्वजों का जन्म हुआ...

फिर हमारे पूर्वजों के ईश्वरीय वीर्य से हमारे माता-पिता का जन्म हुआ.

फिर हमारे माता-पिता के ईश्वरीय वीर्य से हमारा जन्म हुआ.

और वर्तमान में वही ईश्वरीय वीर्य हमारे शरीर में है.

ईश्वरीय प्राणमय संसार में सभी मनुष्य, प्राणी और वनस्पति का वंशक्रम, समान रूप से इसी तरह चलता है. इस जीवन चक्र में, एक ईश्वरीय नियम और एक वैज्ञानिक प्रमाण ध्यान देने योग्य है.

यह एक ईश्वरीय नियम है कि किसी भी मनुष्य, प्राणी और वनस्पति का जन्म, उनके माता‑पिता के वीर्य या बीज से ही होता है. जन्म और मृत्यु के बीच जीवन संक्षिप्त ही रहता है, लेकिन जीवन की जीवित अवस्था में ही, मनुष्य अपने वीर्य से अपनी संतान को जन्म देता है. इस प्रकार स्वयं ईश्वर के द्वारा बनाया हुआ वही ईश्वरीय वीर्य, जीवित अवस्था में ही एक से अनेक में विभाजित होते हुए, पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होता जाता है. वीर्य की इसी प्राणमय निरंतरता के कारण ईश्वर का पवित्र अंश, जो प्रथम-जीवन के वीर्य में था, हमारे पूर्वजों और माता-पिता से स्थानांतरित होते हुए, आज हमारे वीर्य में है. सृष्टि के आरंभ से आज तक, हर समय हर काल में हमारा वीर्य हमेशा अमर रहा है और भविष्य की पीढ़ियों में भी हमेशा अमर ही रहेगा. इस ईश्वरीय नियम से यह स्वयं सिद्ध होता है कि जीवन चक्र में ईश्वर का वही एकमात्र ईश्वरीय वीर्य आगे बढ़ता जाता है.

यह एक वैज्ञानिक प्रमाण है कि वीर्य ही शरीर की सभी कोशिकाएं बनाता है, और प्रत्येक कोशिका के क्रोमोजोम में हमारी स्वयं और पूर्ववर्ती सभी पीढ़ियों की पहचान, विशेष डीएनए जेनेटिक जींस के रूप में रहती है. जिस तरह हमारे अंतिम डीएनए जींस के साथ हमारे माता-पिता की पहचान होती है, विज्ञान की उसी मान्यता के अनुसार, प्रथम-जीवन के प्रथम डीएनए जींस के साथ परम पिता ईश्वर की पहचान थी. तब से वीर्य से वीर्य द्वारा पीढ़ियों का जीवन चक्र चल रहा है और हर पीढ़ी की पहचान डीएनए जींस में जुड़ती जाती है. हमारी प्रत्येक कोशिका के डीएनए जींस में हमारे माता‑पिता और पूर्वजों से होते हुए, प्रथम-जीवन और ईश्वर तक की संपूर्ण जानकारी मौजूद है. इस तरह ईश्वरीय वीर्य में शुक्राणु या अंडाणु होते हैं, जिसके नाभिक में क्रोमोजोम होता है, और क्रोमोजोम में डीएनए जींस होते हैं, जिनका प्रथम डीएनए जींस स्वयं ईश्वर का अंश है.

इस प्रकार, उपरोक्त ईश्वरीय नियम और वैज्ञानिक प्रमाण से स्वतः ही साबित होता है कि वीर्य ईश्वर है. हमारे शास्त्रों और विद्वानों का कथन है कि मनुष्य स्वयं ईश्वर ही है. लेकिन विभिन्न मान्यताओं और विश्वास के भ्रम जाल में हम ईश्वर से सीधा संबंध नहीं जोड़ पाते और ईश्वर की खोज एक पहेली ही लगती है. यहाँ बताये गए आसान से तर्क के द्वारा यह स्पष्ट है कि वीर्य के माध्यम से ही हम ईश्वर के संपर्क में है. मैं वीर्य हूँ और वीर्य ईश्वर हैइस स्पष्टीकरण से स्वयं सिद्ध होता है कि वीर्य के माध्यम से मैं ईश्वर हूँ’.

बुद्धि सपने देखती है और वीर्य उन्हें साकार करता है

हमारा जन्मदाता वीर्य ही ईश्वर का सूक्ष्मतम रूप है, जो अपार शक्ति और अखंड आनंद का अनंत भंडार है. ईश्वर के दो अनमोल वरदानों, वीर्य और बुद्धि के साथ मनुष्य स्वयं ईश्वर ही है. सपने देखना बुद्धि का काम है और उनको साकार करना वीर्य का काम है. लेकिन गलत मान्यताओं और अज्ञानता के कारण मनुष्य ने ईश्वरीय वीर्य को काम वासना और संतानोत्पत्ति का जरिया मात्र मान लिया है, यह वर्तमान समय में मनुष्य की सबसे बड़ी गलतफहमी है.

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मनुष्य और वृक्ष में नैसर्गिक समानता है, इसलिए शास्त्रों में, वीर्य को मनुष्य का मूलाधार (जड़) और बुद्धि को सहस्रार (शिखर) माना गया है. जड़ के माध्यम से शिखर को आवश्यक भोजन मिलता है, जिससे क्रमशः फूलफल और बीज लगते हैं और वृक्ष को निश्चित सफलता मिलती है. इसी प्रकार मूलाधार वीर्य से हारमोंस बनते हैं, जिससे हमारी बुद्धि में भावनाएँ और विचार प्रक्रिया चलती है. विचारों के अनुसार ही हमें क्रमशः योजनाकार्य और परिणाम प्राप्त होते हैं और हमें सफलता मिलती है. यदि वृक्ष के शिखर को जड़ से अलग कर दिया जाये तो वह सूख जाता है, उसी प्रकार यदि मनुष्य मूलाधार वीर्य का क्षरण करता है तो सहस्रार बुद्धि को सभी कार्यों में असफलता ही मिलती है. वीर्य-क्षरण करना अपनी स्वयं की जड़ें काटने जैसा है, क्योंकि शारीरिक और मानसिक रूप से वीर्य‑क्षरण करने से अपनी स्वयं की ईश्वरीय शक्ति ख़त्म होती है. यही मनुष्य के सारे दुखों का एकमात्र कारण है. मनुष्य बुद्धि को बढ़ाने ले लिए तो बहुत उपाय करता रहता है, लेकिन जीवन में सफलता के लिए वीर्य-रक्षा का पालन नहीं किया, तो बड़ी से बड़ी शिक्षा का भी कोई महत्व नहीं है.

प्राचीन काल से ही विद्वानों ने जीवन में उच्च सफलता पाने के लिए ब्रह्मचर्य का सिद्धांत बताया है, जिसकी मूल शिक्षा वीर्य की रक्षा करना ही है. प्राचीन काल से आज तक दुनिया के सभी महापुरुषों ने, जाने-अनजाने सफलता के एकमात्र सिद्धांत वीर्य-रक्षा का शत‑प्रतिशत पालन करते हुए ही, अपार सफलता पाई है.

सफलता का शार्टकट वीर्य-रक्षा

उसी प्राचीन सिद्धांत का एक तथ्यात्मक विश्लेषण है.

हमारे अपने जीवन में उच्च सफलता पाने के लिए, इस पुस्तक को पढ़ें, पालन करें और शेयर करें.

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